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बाइबल में · लगभग 60–62 ईसवी · रोम

रोम में पौलुस

माल्टा पर जहाज टूटने के बाद पौलुस रोम पहुँचता है, जहाँ वह दो वर्ष तक पहरे में रहता है और मिलने आनेवालों से मिलता है।

प्रेरि 28:11–31तीन महीने के बाद हम सिकन्दरिया के एक जहाज पर चल निकले, जो उस टापू में जाड़े काट रहा था, और जिसका चिन्ह दियुसकूरी था। सुरकूसा में लंगर डाल करके हम तीन दिन टिके रहे। वहाँ से हम घूमकर रेगियुम में आए; और एक दिन के बाद दक्षिणी हवा चली, तब दूसरे दिन पुतियुली में आए। वहाँ हमको कुछ भाई मिले, और उनके कहने से हम उनके यहाँ सात दिन तक रहे; और इस रीति से हम रोम को चले। वहाँ से वे भाई हमारा समाचार सुनकर अप्पियुस के चौक और तीन-सराय तक हमारी भेंट करने को निकल आए, जिन्हें देखकर पौलुस ने परमेश्वर का धन्यवाद किया, और ढाढ़स बाँधा। जब हम रोम में पहुँचे, तो पौलुस को एक सिपाही के साथ जो उसकी रखवाली करता था, अकेले रहने की आज्ञा हुई। तीन दिन के बाद उसने यहूदियों के प्रमुख लोगों को बुलाया, और जब वे इकट्ठे हुए तो उनसे कहा, “हे भाइयों, मैंने अपने लोगों के या पूर्वजों की प्रथाओं के विरोध में कुछ भी नहीं किया, फिर भी बन्दी बनाकर यरूशलेम से रोमियों के हाथ सौंपा गया। उन्होंने मुझे जाँचकर छोड़ देना चाहा, क्योंकि मुझ में मृत्यु के योग्य कोई दोष न था। परन्तु जब यहूदी इसके विरोध में बोलने लगे, तो मुझे कैसर की दुहाई देनी पड़ी; यह नहीं कि मुझे अपने लोगों पर कोई दोष लगाना था। इसलिए मैंने तुम को बुलाया है, कि तुम से मिलूँ और बातचीत करूँ; क्योंकि इस्राएल की आशा के लिये मैं इस जंजीर से जकड़ा हुआ हूँ।” उन्होंने उससे कहा, “न हमने तेरे विषय में यहूदियों से चिट्ठियाँ पाईं, और न भाइयों में से किसी ने आकर तेरे विषय में कुछ बताया, और न बुरा कहा। परन्तु तेरा विचार क्या है? वही हम तुझ से सुनना चाहते हैं, क्योंकि हम जानते हैं, कि हर जगह इस मत के विरोध में लोग बातें करते हैं।” तब उन्होंने उसके लिये एक दिन ठहराया, और बहुत से लोग उसके यहाँ इकट्ठे हुए, और वह परमेश्वर के राज्य की गवाही देता हुआ, और मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों से यीशु के विषय में समझा-समझाकर भोर से साँझ तक वर्णन करता रहा। तब कुछ ने उन बातों को मान लिया, और कुछ ने विश्वास न किया। जब वे आपस में एकमत न हुए, तो पौलुस के इस एक बात के कहने पर चले गए, “पवित्र आत्मा ने यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा तुम्हारे पूर्वजों से ठीक ही कहा, ‘जाकर इन लोगों से कह, कि सुनते तो रहोगे, परन्तु न समझोगे, और देखते तो रहोगे, परन्तु न बूझोगे; क्योंकि इन लोगों का मन मोटा, और उनके कान भारी हो गए हैं, और उन्होंने अपनी आँखें बन्द की हैं, ऐसा न हो कि वे कभी आँखों से देखें, और कानों से सुनें, और मन से समझें और फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूँ।’ “अतः तुम जानो, कि परमेश्वर के इस उद्धार की कथा अन्यजातियों के पास भेजी गई है, और वे सुनेंगे।” जब उसने यह कहा तो यहूदी आपस में बहुत विवाद करने लगे और वहाँ से चले गए। और पौलुस पूरे दो वर्ष अपने किराये के घर में रहा, और जो उसके पास आते थे, उन सबसे मिलता रहा और बिना रोक-टोक बहुत निडर होकर परमेश्वर के राज्य का प्रचार करता और प्रभु यीशु मसीह की बातें सिखाता रहा।

उसी समय संसार में

प्रेरितों के काम इस बात पर समाप्त होता है कि पौलुस लगभग 60–62 ईसवी में दो वर्ष तक रोम में पहरे में रहा और किराये के घर में खुलकर शिक्षा देता रहा (प्रेरितों के काम 28:30–31)। सम्राट नीरो था। यह रहा 60 के दशक ईसवी का संसार।

यूनान और रोमरोम की बड़ी आगजुलाई 64 ईसवी

एक आग कई दिनों तक जलती रही और नगर के बड़े भाग को नष्ट कर दिया। इतिहासकार टैसिटस लिखता है कि नीरो ने इसका दोष मसीहियों पर डाला और उनमें से बहुतों को मरवा डाला — रोम द्वारा मसीहियों के उत्पीड़न का सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण।

यूनान और रोमबूडिका का विद्रोह60/61 ईसवी

ब्रिटेन में आइसेनी जनजाति की रानी बूडिका ने एक बड़े विद्रोह की अगुवाई की और लोंडिनियम को — वह नया रोमी नगर जो आगे चलकर लंदन बना — जला दिया, फिर रोमियों ने उसे हरा दिया।

मिस्रहेरोन का भाप-यन्त्रलगभग 62 ईसवी

सिकन्दरिया में अभियन्ता हेरोन ने भाप से घूमने वाली एक गेंद और हवा व पानी से चलने वाली मशीनों का वर्णन किया। उसकी तिथि आम तौर पर उसके द्वारा उल्लिखित एक चन्द्रग्रहण से तय की जाती है, जो 62 ईसवी के एक ग्रहण से मेल खाता है।

चीनबौद्ध धर्म चीन पहुँचता है68 ईसवी (परम्परा के अनुसार)

चीनी परम्परा के अनुसार हान सम्राट मिंग ने एक सुनहरी आकृति का स्वप्न देखा और पश्चिम की ओर दूत भेजे। वे बौद्ध भिक्षुओं और ग्रन्थों के साथ लौटे, और उनके लिए लुओयांग में श्वेत अश्व मन्दिर बनाया गया — चीन का पहला बौद्ध मन्दिर।

भारतकुषाण साम्राज्यलगभग 30 ईसवी से

मध्य एशिया से आए कुषाण राजाओं ने आज के अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत में फैला एक साम्राज्य बनाया। उनके प्रदेश उन मार्गों पर थे जो रोम, भारत और चीन को जोड़ते थे।

पूर्वी यूरोप और स्टेपीनीपर पर अन्द्रियास (परम्परा)परम्परा लगभग 1110 ईसवी में लिखी गई

लगभग 1110 में संकलित कीव का प्राथमिक इतिवृत्त बताता है कि प्रेरित अन्द्रियास नाव से नीपर पर ऊपर की ओर गया, उन पहाड़ियों पर एक क्रूस खड़ा किया जहाँ आगे चलकर कीव बसा, और वहाँ एक बड़े नगर की भविष्यवाणी की। इतिहासकार इसे एक दन्तकथा मानते हैं; एक पुरानी परम्परा अन्द्रियास के प्रचार-क्षेत्र के रूप में स्कूतिया का नाम लेती है।

स्रोत

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घटनाएँ: Theographic (CC BY-SA 4.0) · स्थान: OpenBible.info (CC BY 4.0) · तिथियाँ अनुमानित हैं

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